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बाइसा के पीले हाथ होने से पहले… शादी कार्ड ने उजाड़ दी दुनिया

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भींडर से लौटते समय हुए हादसे में मावली तहसील करणी सेना अध्यक्ष राहुल सिंह सारंगदेवोत की मौत—
दिखावटी परंपराओं पर समाज से सवाल: “जब रिवाज़ जान लेने लगे, तो वह परंपरा नहीं… जिद बन जाती है।”

भींडर/मावली – शादी का निमंत्रण-पत्र जिसे परंपरागत रूप से खुशियों का संदेश माना जाता है, गुरुवार रात भींडर क्षेत्र के एक परिवार के लिए गहरा दर्द बन गया। श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना मावली तहसील अध्यक्ष राहुल सिंह सारंगदेवोत अपनी शादी के कार्ड बांटकर लौट रहे थे, तभी लौटते समय हुए हादसे ने उनकी जान ले ली।

जो कार्ड खुशी बांटने निकला था, वही उनकी जिंदगी का अंतिम सफर साबित हुआ। इस दर्दनाक घटना ने समाज में दिखावे वाली परंपराओं पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

11 दिसंबर को शादी थी।
घर में रंग, रोशनी और खुशियों की तैयारियाँ थीं —
लेकिन उससे कुछ दिन पहले ही खुशी का सबसे सुंदर सपना, सबसे बड़ा मातम बन गया।

“यह परंपरा नहीं—समाज पर थोप दी गई जिद है”

समाज सेवी अर्जुन सिंह चुंडावत ने कहा कि पुरानी परंपराओं के नाम पर लोग अब भी जोखिम उठाते हैं, जबकि समय बदल चुका है।
उन्होंने कहा कि कार्ड बांटने की शुरुआत उस दौर में हुई थी जब न मोबाइल थे, न इंटरनेट।
आज के डिजिटल युग में दिखाई देने के लिए सफर करना और दुर्घटनाओं का खतरा मोल लेना समझदारी नहीं, बल्कि मूर्खता है।

बहनों के ‘आणा’ पर भी विचार जरूरी

चुंडावत ने कहा कि बहनों का सम्मान किसी डिब्बे या वजन का मोहताज़ नहीं।
आज डिजिटल माध्यम सम्मान प्रेषित करने का सबसे सुरक्षित और ससम्मान तरीका है।

समाज पर तमाम कुरीतियों का बोझ

उन्होंने साथ ही समाज की अन्य कुरीतियों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया —
महंगे कार्ड, भारी रोकड़, दहेज, दिखावटी भोज और अनावश्यक रस्में,
जिन्होंने युवा पीढ़ी और परिवारों पर आर्थिक व मानसिक बोझ बढ़ाया है।

“सम्मान खर्च से नहीं—संस्कार से होता है। संस्कृति दिखावे से नहीं—संरक्षण से बचती है।”

बदलाव की जरूरत पर संकल्प

दुर्घटना से उपजा दुःख समाज के लिए चेतावनी भी है।
अभियानकर्ताओं का कहना है कि अब समाज को संकल्प लेना होगा—

  • न कार्ड छपें
  • न दिखावे की रस्में
  • न दहेज व तिलक का बोझ
  • डिजिटल निमंत्रण अपनाए जाएँ

समाज को परंपरा नहीं, जीवन और संस्कृति की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए।

फैक्ट फाइल

  • डिजिटल निमंत्रण — अधिक सुरक्षित और खर्चमुक्त
  • डिजिटल आणा — सम्मानपूर्ण व दिखावारहित
  • दहेज और भारी रोकड़ की प्रवृत्ति पर रोक
  • संस्कार प्रमुख — दिखावा शून्य समाज

विशेष टिप्पणी

अर्जुन सिंह चुंडावत ने कहा —

“संस्कृति बदलती नहीं, सुरक्षित होती है। बदलाव जीवन बचाता है, और जीवन से बड़ी कोई परंपरा नहीं।”

यह घटना केवल एक परिवार का दुःख भर नहीं, बल्कि समाज के लिये चेतावनी है —
यदि बदलाव आज से शुरू होगा, तो कल किसी माँ की गोद हमेशा के लिये खाली नहीं होगी।

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